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LG’s Speech on Mahavir Jayanti

Date: 
Wednesday, April 20, 2016

जैन धर्म दुनिया का सबसे पुराना धर्म है। हम यह दावे के साथ कह सकते हैं कि जैन धर्म ने पिछले 5000 सालों में अहिंसा के सिद्धांत पर कभी समझौता नहीं किया। 24वें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामी एक ऐसे महान रूहानी विजेता थे जिन्होंने संयम और नियम के मार्ग पर चलकर मानव जाति को मोक्ष प्राप्ति का संदेश दिया। उनका यह संदेश आज भी सारी दुनिया को एक नया रास्ता दिखाता है। उनकी यह अवधारणा कि मोक्ष जन्म या मृत्यु की घटना मात्र से जुड़ा हुआ नहीं है। बल्कि मोक्ष का रास्ता एक जीवनभर की कोशिश है। मैं इस महान शख्सियत के लिए यही शेर कहूँगा कि-

हजारों साल नरगिस अपनी बेनूरी पे रोती है

बड़ी मुश्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

आज की दुनिया के लिए भगवान महावीर स्वामी का संदेश बहुत बड़े मायने रखता है। जैन धर्म का सबसे महत्वपूर्ण सिद्धांत है अहिंसा। दुनिया के हर एक जीव मात्र के प्रति अहिंसा का भाव। जैसा कि आचरंग सूत्र में कहा गया है कि-

“All breathing, existing, living, sentient creatures should not be slain, nor treated with violence, nor abused, nor tormented, nor driven away. This is the pure, unchangeable, eternal law, which the clever ones, who understand the world, have proclaimed,”

जैनधर्म की सबसे बड़ी खासियत यह है कि यह हिंसा को केवल मानवमात्र या जीव मात्र को दिये गये कष्ट के परिप्रेक्ष्य में नहीं देखता। बल्कि इसे खुद के ऊपर और उससे भी आगे अपनी रूह के ऊपर हमला मानता है। इस तरह न केवल शारीरिक हिंसा बल्कि हिंसा के लिए किसी भी तरह की प्रेरणा का, दूसरों को किसी के विरूद्ध हिंसा के लिए प्रेरित करने को या शांत रहकर हिंसा में सहयोगी बनने को भी जैनधर्म हिंसा मानता है।

हिंदुस्तान के सूफी और भक्ति मार्ग के संतों ने भी दया, करूणा और प्रेम के रास्ते पर चलते हुए खुद के लिए कभी कुछ नहीं मांगा और मानवता के कल्याण की बात कही। कबीर, नानक, रैदास निज़ामुद्दीन औलिया, शेख मुइनुद्दीन चिश्ती सभी इंसानी क़दरों के पुजारी थे।

महान सूफी संत शेख सादी कहते हैं –

Grieve not when people injure you,

because neither grief nor peace come from people.

The contrasts of friend and foe come from God.

Although the arrow is not shot from the bow,

wise men look at the archer.

The friends of God are those who drink the wine of grief

and bear their trials and tribulations silently.

No one is more unfortunate than an oppressor of men

for in the days of calamity he has no friend.

स्वामी विवेकानंद ने भी यही कहा कि ’’इतनी साधना और तपस्या के बाद यह सत्य मेरी समझ में आया है कि ईश्वर का वास हर एक जीव में है। इसके अतिरिक्त कोई ईश्वर नहीं है। जीव सेवा ही ईश्वर सेवा है।’’

यह सिर्फ महज इत्तिफ़ाक नहीं है कि हमारे युग के सबसे बड़े नेता महात्मा गांधी के जीवन पर जैन दर्शन की इतनी गहरी छाप थी। बचपन में ही गांधीजी का जैन जीवन मूल्यों से सामना हुआ और वही उनके जीवन का नैतिक संबल बन गया। अपनी आत्मकथा में उन्होंने लिखा है कि 18 साल की उम्र में जब वह पढ़ाई के लिए इंग्लैंड जा रहे थे तो उनकी माता बहुत ही परेशान थीं कि मोहनदास विलायत जाकर नैतिक रूप से भ्रष्ट हो जायेगा। उन्होंने जैन मुनि बेचारजी स्वामी से इस बारे में सलाह ली। मुनि महाराज ने कहा कि मोहनदास को अपनी मां के सामने प्रतिज्ञा करनी चाहिये और मां को वचन देकर वह विलायत जा सकता है। गांधी जी कहते हैं कि स्वामी जी ने मुझे शपथ दिलाई कि मदिरा एवं अन्य चीज़ों का कभी इस्तेमाल नहीं करूंगा और उन्हें मां से लंदन जाने की इजाज़त मिल गई।

जैन धर्म के अहिंसा के उसूल ने गांधी जी की राजनीतिक विचारधारा को और खासतौर पर सत्याग्रह की नीति को बहुत प्रभावित किया था। इसमें उनके दोस्त जैन विद्धान श्रीमद राजचंद्र की अहम भूमिका थी।

गांधी जी कहते थे कि दुनिया का कोई भी मजहब अहिंसा के सिद्धांत को इतनी गहराई से इंसानी जिंदगी के हर पहलू को छूते हुए explain(वजाहत) नहीं करता जितना कि जैन धर्म करता है। जब भी दुनिया के लोग अपने जीवन के Charam Utkarsh (चरम उत्कर्ष) या उसके बाद की गति को प्राप्त करने के लिए अहिंसा के परम आदर्श को आचरण में लाने की कोशिश करेंगे तो जैन धर्म का मकाम सबसे आला होगा और महावीर स्वामी को अहिंसा का सबसे बड़ा पुजारी माना जायेगा। ’’

जैन मज़हब का एक और खास पहलू जिस पर विद्वानों कोधर्म गुरुआंदार्शनिकों और खास तौर से राजनीतिज्ञों को ज्यादा तवज्जो देनी चाहिए वह है जैनधर्म का Anekantvad (अनेकांतवाद) जिसे ’’बौद्धिक अहिंसा’’ भी कहा जाता है। सीधे सरल शब्दों में जिसका मतलब है सत्य की रिलेटिविटी ¼relativity½ का सिद्धांत। जैन धर्म के लोग मानते हैं कि सत्य के बेशुमार रूप हैंबेशुमार पहलू हैं और कोई भी पूरे तौर पर इसकी इस्लाह नहीं कर सकता। Anekantvad (अनेकांतवाद) विश्व को विविध रूपी मानता है। इसी से समयस्थानप्रकृति के संदर्भ में विचारकों के अलग-अलग दृष्टिकोण बनते हैं। वह जो कि देखनेवाला है और जो देखा जा रहा हैकुछ भी परम सत्य नहीं है। जो एक दृष्टिकोण से सच है यह जरूरी नहीं कि वह दूसरे दृष्टिकोण से भी सच हो। किसी एक दृष्टि से परम सत्य की खोज करना असंभव और अतार्किक है क्योंकि परम सत्य या सार्वभौमिक सत्य विभिन्न दृष्टिकोणों का एक पूर्ण योग है जिस से यह ब्रह्माण्ड बना है।

काबिले गौर बात यह है कि यह विचारधारा अलग-अलग लोगों के लिए अलग विचार दृष्टि और दूसरी जीवन-अवस्थाओं की वैधता को कुबूल करती है। लेकिन यह कहना एक तरह की नादानी होगी कि Anekantvad (अनेकांतवाद) मुख्तलिफ विचारधाराओं के बीच सिर्फ एक समझौता है। यह किसी के मूल्यों और सिद्धांतों का dilution भी नहीं है। इसके विपरीतAnekantvad (अनेकांतवाद) सत्य की खोज को सबसे बड़ा आध्यात्मिक मक़सद मानता है। अगर हम Anekantvad (अनेकांतवाद) के सिद्धांत को अपना लें तो Tolerance और Intolerance की पूरी बहस बेमानी हो जाती है।

भीषण संघर्ष और हिंसक वैचारिक विरोध के इस दौर में Anekantvad (अनेकांतवाद) सभी आध्यात्मिक परंपराओं की हमआहंगीतआव्वुनसहयोग और बराबरी का मार्ग दिखाता है। मशहूर आधुनिक संत विजयवल्लभ सूरी ने कहा है कि न मैं जैन हूँन बौद्धन वैष्णव न शैव न हिन्दू न मुसलमान। मैं तो परमात्मा द्वारा दिखाये गये शांति के मार्ग का एक पथिक हूँ। एक ऐसा ईश्वर जो सभी भावों से परे है। लगभग यही सोच आदिशंकराचार्य के आत्मशतकम से सामने आती है –

Na Punyam Na Papam

Na Saukhyam Na Dukham

Na Mantro Na Tirtham Na Veda Na Yagya

Aham Bhojnam Naiv Bhojyam Na Bhokta

Chidananda Rupah Shivoham Shivoham

आज के भौतिकतावादी युग में जहां धर्म को लेकर हत्याएं और मानवता के प्रति जघन्य अपराध हो रहे हैं वहां जैन विचारधारा संवादसहयोग और सह अस्तित्व के नये आयाम खोलती है।

जैन धर्म का भारतीय संस्कृति की धरोहर में योगदान इस धर्म के महान दर्शन से भी ज्यादा बढ़कर है। हम इसे तमाम धर्म ग्रंथोंपाण्डुलिपियों भवनोंमंदिरों के विकास के रूप में पूरे देश में देख सकते हैं।

जैन धर्म का संदेश उच्च मानव मूल्यों के परिष्कार का संदेश है। मैं व्यक्तिगत रूप से जैन धर्म के करुणादयाअहिंसा के सिद्धांतों से अभिभूत हूं और यह मानता हूं कि आतंकवादघृणाभेदभाव और गैरबराबरी को समांप्त करने में जैन धर्म की महत्वपूर्ण भूमिका है। मैं आप सब से यह अपील करता हूं कि जैन धर्म के आदर्शों पर चलकर विश्व कल्याण के पथ को प्रशस्त करें।

धन्यवादजय जिनेन्द्र! जय हिन्द!

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