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LG’s Speech at Aligarh Muslim University

Date: 
Friday, October 17, 2014

जनाब वाईस चांसलर साहब, जनाब प्रो-वाईस चांसलर साहब, यूनिवर्सिटी के रजिस्ट्रार, मुख्तलिफ शोबों के सदर, सेंटर्स के डायरेक्टर, मौजूद मेहमान और इस आलिशान यूनिवर्सिटी के तालिबे इल्म ।

सच बात तो यह है कि मैं अपने आपको इस फंक्षन के Chief Guest के लायक नहीं समझता हूँ । इस मौके पर सालों से हिन्दुस्तान की अज़ीम शख्सियतों ने हिस्सा लिया और मेरा नाम उस फेहरिस्त में नहीं है । लेकिन यह सच है कि आपकी अज़ीम यूनिवर्सिटी से मेरे खानदान का बहुत पुराना ताल्लुक है । यूनिवर्सिटी क़ायम होने से पहले जब यह मदरसा था, डेढ़ सौ साल पहले इसके पहलेStudent मेरे दादा हमीद उल्लाह खान साहब थे और इसकी नींव हमारे घर समी मंजि़ल में मेरे परदादा मौलवी समी उल्लाह खान साहब ने रखी थी । मौलवी समी उल्लाह खान साहब ने अपनी किताब मुसाफि़राने लंदन में ये वाक्या लिखा है -

‘8 जनवरी 1877 को जब कालेज के बाक़ाइदा इफ़तिताह का वक़्त आया तो मैं (यानी समी उल्लाह खान) और सर सैयद नमाज़े तहज्जुद के वक़्त उठ कर मैदाने तामीर में गए । तबीअतों में क़ौमी हमदर्दी, दिल में एक अजीब कैफि़यत तारी थी। जि़न्दगी और तरक़्क़ी के ख़्वाब की पहली ताबीर, तबीअत में जोषो वलवला था, गिरया तारी हो गया । हम दोनों रोते जाते थे, रब्बे ज़ुलजलाल के सामने गुनाहों का एतराफ़ करते जाते थे और उसके फ़ज़लो बख़शिश के लिए हमारी ज़बानों पर दुआ थी। सर सैयद मुझसे इसरार करते थे के मैं संगे बुनियाद रख्खूँ और मैं सर सैयद से इसरार करता था । आखि़र सर सैयद का इसरार ग़लिब आया और मैंने इन्तिहाई रिक़्क़ते क़ल्ब के साथ यह फ़रीज़ा अंजाम दिया ।’

मैंने खुद भी यहां Admission के लिए Apply किया था लेकिन जब तक मुझे Admission मिलता मेरा दाखि़ला दिल्ली के सेंट स्टीफन कालेज में हो गया और मेरी बदकिस्मती कि मैं अलीगढ़ मुस्लिम यूनिवर्सिटी का छात्र नहीं हो सका ।

सर सैयदका मुक़ाम हिन्दुस्तान की तारीख़ में अनोखा है । आज उनका नाम लेते हुए मुझे ग़ालिब का वो शेर याद आता है:

‘ ज़ुबान पर बारे खुदाया ये किसका नाम आया

कि मेरे नुत्क़ ने बोसे मेरी ज़ुबान के लिए’’

गांधी जी ने सर सैयद को Prophet of Education कहा है । लेकिन Education ही नहीं सर सैयद का Contribution चैतरफा रहा है और एक तरह से तो वे महात्मा गांधी की तरह क़ौम के मार्गदर्षक रहे हैं । जिस ज़माने में हिन्दू मुस्लिम विवाद बढ़ रहा था तब 1883 में उन्होंने पटना में एक ऐतिहासिक तकरीर की थी, जो Inter faith harmony के लिए एक मिसाल है । उन्होंने कहा कि-

“In India there live two prominent nations which are distinguished by the names of Hindus and Mussulmans. Just as a man has some principal organs, similarly these two nations are like the principal limbs of India. To be a Hindu or a Muslim is a matter of internal faith which has nothing to do with mutual relationship and external conditions. How good is the saying, whoever may be its author, that a human being is composed of two elements – his faith which he owes to God and his moral sympathy which he owes to his fellow-being. Hence leave God’s share to God and concern yourself with the share that is yours.”

हर साल आपके यहाँ इस तारीख़ी दिन पर एक बड़े ज़लसे का आयोजन होता है । हर साल आपAligarh Movement को और अपने मशहूर Students की याद करते हैं । ये फेहरिस्त तवील है - राजा महेन्द्र प्रताप, डाक्टर ज़ाकिर हुसैन, ख़ान अब्दुल गफ़्फ़ार ख़ान साहब, रफी अहमद किदवई, शेरे कश्मीर-जनाब शेख अब्दुल्ला, हसरत मोहानी, अली सरदार जाफरी, ख्वाजा अहमद अब्बास, मशहूर खिलाड़ी लाला अमरनाथ, ज़फर इकबाल और कार्डियोलोजिस्ट डा. अशोक सेठ जैसे नाम इस फेहरिस्त में है । आज अलीगढ़ के तुलबा की पूरी टीम दुनिया के हर कोने में मौजूद है । AMU Old Boys Association की शक्ल में आस्ट्रेलिया से लेकर अमेरिका तक अलीगढ़ वाले अपना नाम कमा रहे हैं ।

तो हर साल सर सैयद की याद में मनाये जाने वाले इस मुकद्दस दिन पर आपके माज़ी का जि़क्र आता है और पिछले सौ साल की तारीख़ का फख्ऱ के साथ ब्यान होता है । लेकिन मैं आज आप के सामने माज़ी की नहीं बल्कि मुस्तक़बिल की बात करना चाहूँगा । आपके सामने आपके भविश्य का सवाल है और आपको तय करना है कि आप खु़द को, अपनी क़ौम को और अपने मुल्क को कहाँ देखना चाहते हैं । इस मौके पर आपको इकबाल का कलाम याद दिलाता हूँ-

‘‘खोल आँख ज़मीन देख, फ़लक देख, फज़ा देख

मशरीक से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख !

इस जलव-ए बे परदा को परदों में छिपा देख

अ्ययाम-ए-जुदाई के सितम देख, जफा देख !

है तेरे तसररूफ़ में यह बादल ये घटाऐं

ये गुंबदे अफलाक़ ये ख़ामोश फज़ायं

यह कोह, यह सहरा, यह समन्दर, ये हवायें

थीं पेशे नज़र कल तो फरिश्तों की अदाऐं

आईनए अ्ययाम में आज अपनी अदा देख

खोल आँख ज़मीन देख, फ़लक देख, फ़ज़ा देख

मशरीक से उभरते हुए सूरज को ज़रा देख !’’

आप कहां पहुँच सकते है इसका अंदाजा यद खुद आपको नहीं है । मैं आहवान करता हूँ कि अपने दिमाग की खिड़कियाँ खोल दें और एक नये नज़रिये से और नई आँखों से अपने मुस्तक़बिल की तरफ देखें । आपने, या समाज ने, या (माहौल) Enviornment ने आपके जो ज़ंजीरें डाली हैं, उन्हें तोड़ डालिये । बकौल जाँनिसार अख़्तर -

‘‘अपने तारीक मकानों से तो बाहर झाँको

जि़ंदगी शम्मा लिये दर पे खड़ी है यारो ।’’

इस यूनिवर्सिटी की बेहतरीन सुविधायें - ये इमारतें, ये Class Room, ये Library, आपकेHostel, आपके खेल के मैदान, आपके मशहूर और मारूफ़ उस्ताद- ये सभी एक हद तक फायदेमंद हैं । लेकिन असली फार्मूला तो आपके अंदर है । आपको ज़रूरत है एक नये जुनून की, एक नये इंकलाब की,जो जिंदगी में नया मोड़ ला सके । यह वो जुनून होगा जो अर्जुन के तीर की तरह मछली की घूमती हुई आँख को देखे ना कि इधर-उधर हो रही बाधाओं पर निगाह डाले ।

अगर मुस्तक़बिल बनाना है तो यह समझ लें-

‘‘तू शाहीं है परबाज़ है काम तेरा

चमन और भी आषियाँ और भी हैं ।’’

अपने सामने की सब बेडि़याँ तोड़ डालिये, अपने ऊपर लादे सामाजिक दबाव और Physical Limitations को खत्म कर डालें । समझ लीजिये आप वो शाहीं है जिसकी परवाज़ पर कोई रोक नहीं हो सकती । आपको अपने Background से निकलना होगा । आपको यह समझना है कि आप न मशरिक के हैं और ना मग़रिब के, बल्कि अल्लाह के बनाये हुये अशरफल मख़लूक़ात हैं जिसका मैदान ये पूरी कायनात है ।

आज मुल्क को और क़ौम को एक नई आज़ाद ख्याली की ज़रूरत है । और अगर कहीं से यह कयादत निकल सकती है तो वो है Aligarh Muslim University. मेरा मानना है कि आप खुद अपनी ताकत नहीं समझ रहे और इसलिए अपने मिशन को सीमित कर रहे हैं । आप अपने को किसी छोटे-मोटे Political Role में ना देखें, अपने को किसी तहसील के मुंसिफ के रूप में ना देखें, किसी क्लास-2 के मुलाज़मात की तरह से न देखें । बल्कि ऊँची छलांग लगायें, मुझे यक़ीन है कि आप मुंसिफ कोर्ट में नहीं सुप्रीम कोर्ट में वकालत करेंगे । आपकी छोटी-मोटी Medical Practice नहीं होगी । आप हिन्दुस्तान, अमेरिका या दूसरे मुल्कों के आला से आला अस्पताल में डाक्टर होंगे । आप क्लास-2सर्विस में नहीं बल्कि IAS, IPS और Foreign Service में Officers होंगे । आप किसी छोटे-मोटे दल के नेता नहीं बल्कि पूरे हिन्दुस्तान की क़यादत कर सकते हैं, अपनी क़ौम की क़यादत कर सकते हैं । और हिन्दुस्तान और क़ौम का नेतृत्व बाहर के मुल्कों में करने का माद्दा भी आप में है ।

आज एक नये Aligarh Movement को खड़ा करने का वक्त है । Modern Education के साथ modern ख्यालात की भी ज़रूरत है । यहां ज़रूरत है प्रगतिशील राजनैतिक, सामाजिक और धार्मिक सोच की A Secularism क्या है ? प्रगतिशील सोच क्या है ? या राष्ट्रवाद क्या है ? Modernविचारधारा के साथ-साथ Aligarh के एक-एक तालिबे इल्म को इंसानियत का सच्चा सिपाही बनकर खड़ा होना होगा क्योंकि इंसानियत से बढ़कर कोई मज़हब नहीं, इंसानियत से बढ़कर कोई पंथ नहीं, और इंसानियत से बढ़कर कोई विचारधारा नहीं है । मैं आज इस मंच से आहवान करता हूं कि अपनी ही यूनिवर्सिटी के तराने को मंत्र के रूप में समझ लें और याद करें मजाज़ के वो अलफाज़ -

जो अब्र यहाँ से उठेगा वो सारे जहाँ पर बरसेगा

हर जू-ए-रवाँ पर बरसेगा, हर क़ोहे-गिराँ पर बरसेगा

हर सर्व ओ समन पर बरसेगा, हर दश्त-ओ-दमन पर बरसेगा

खुद अपने चमन पर बरसेगा, गैरों के चमन पर बरसेगा।

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